राजस्थान की लोक कलाएँ : Folk Arts of Rajasthan

By | June 16, 2021
raajasthaan kee lok kalaye

राजस्थान की लोक कलाएँ (Folk Arts of Rajasthan)

राजस्थान की लोक कलाओ ने विश्वभर में अपनी एक पहचान बनाई है। किसी विशेष क्षेत्र की लोक अथवा सामान्य जन की कला लोक कला कहलाती है। वस्तुओं की सहायता से अपने सुन्दरतम रूप में प्रस्तुत होती है तो वह लोककला का स्वरूप ग्रहण करती है। लोककलाएँ जहाँ एक ओर लोकमानस की जीवन्तता को मुखरित करती हैं, वहीं दूसरी ओर उनके विश्वविद्युत स्वरूप को भी रूपायित करती हैं। राजस्थान की लोककलाओं ने विश्व बाजार और कलाप्रेमियों के मन में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। राजस्थान की प्रमुख लोक कलाएँ निम्न हैं :-

पड़ चित्रण

  • पड़ चित्रण में रेजी अथवा खादी के कपड़े पर लोक देवताओं की जीवनगाथाएँ, धार्मिक व पौराणिक कथाएँ व ऐतिहासिक गाथाओं के चित्रित स्वरूप को ही ‘पड़’ कहा जाता है । शाहपुरा (भीलवाड़ा) पड़ चित्रण का मुख्य केन्द्र है। इसके अलावा भीलवाड़ा तथा चित्तौड भी पड़ों के प्रसिद्ध स्थल हैं। पड़े  चित्रित करने का कार्य यहाँ के जोशी गोत्र के छीपे करते हैं जिन्हें चितरा कहा जाता है। श्रीलाल जोशी इसके ख्याति प्राप्त चितेरे हैं। जयपुर के प्रदीप मुखर्जी जो श्रीलाल जोशी के शिष्य हैं, भी कुशल पड़ चितेरे हैं। इन्होंने पड़ शैली में नए प्रयोग कर पारम्परिक राजस्थानी लोक गाथाओं के स्थान पर महत्वपूर्ण पौराणिक आख्यानों जैसे श्रीमद्भागवत, गीत गोविन्द आदि का चित्रण किया है।
  • पड़ चित्र शैली में लाल और हरे रंग का विशेष रूप से प्रयोग होता है। चित्रों में आकृति थोड़ी मोटी और गोल, आँखे बड़ी-बड़ी तथा नाक अन्य शैलियों की अपेक्षा छोटी व मोटी होती है। कथा के मुख्य चरित्रों की वेशभूषा लाल रंग और खलनायक की हरे रंग की होती है।
  • पाबूजी, हड़बूजी, देवनारायण जी, गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी, चावंडाजी, भैंसासुर, इंगजी-झुवार जी तथा रामदला आदि की पड़े प्रसिद्ध हैं ।
  • सर्वाधिक लोकप्रिय पड़ ‘पाबूजी’ की है लेकिन देवनारायणजी की सवारी पड़ सबसे लम्बी होती है।
  • देवनारायणजी की पड़ डाक टिकट के रूप में देवनारायण जयन्ती पर 2 सितम्बर, 1992 को भारतीय डाक विभाग ने जारी की है।
  • श्रीमती पार्वती जोशी (श्री कन्हैयालाल जोशी की पत्नी )देश की प्रथम पड़ चितेरी महिला हैं। इसके अलावा गौतली देवी अंतार्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पड कलाकार बन चुकी हैं।
  • पड फट जाने अथवा जीर्णशीर्ण हो जाने पर पुष्कर जी में विसर्जित कर दी जाती है। इसे पड़ ठंड़ी करना कहते हैं । इस अवसर पर भोपे समाज में सवामणी का आयोजन करते

मांडणा

  • मांगलिक अवसरों पर महिलाओं द्वारा घर-आँगन को लीपपोत कर खडिया, हिरमिच व गैरूं से अनामिका की सहायता से ज्यामितीय अलंकरण बनाए जाते हैं जिन्हें राजस्थान में ‘मांडणे’ कहते हैं। ये अलंकरण गुजरात में सातियाँ’, महाराष्ट्र में ‘रंगोली’, बंगाल में ‘अल्पना’, उत्तर प्रदेश में ‘चौक पूरना या सोन’, भोजपुरी अंचल में थापा’, तेलगु में ‘मोगु’, केरल में ‘अत्तापु’, तमिल में ‘कोलम’, बिहार में ‘अहपन’ व ब्रज और बुंदेलखंड में ‘साँझा’ कहलाते हैं।
  • राजस्थान में प्रायः सभी त्यौहारों, उत्सवों, पर्वो, धार्मिक अनुष्ठानों, जन्म-परण-मरण पर मांडणे चित्रित किए जाते हैं । लक्ष्मी, गणेश के चित्र, सातिए, शंख, चक्र, मंगल कलश, ग्रह-नक्षत्र, चाँद, सूरज, सोलह दीपक, गलीचा, घेवरचक्र आदि प्रमुख मांडणे हैं।
  • मांडणे स्त्रियों की कलात्मक अभिरूचि को ही व्यक्त नहीं करते अपितु उनमें छिपी मान्यताओं एवं संस्कारों को भी परिलक्षित करते हैं। कुछ विशेष मांडणे निम्न हैं :-
  • पगल्या – ‘पगल्या’ (पद चिह्न) मांडणा पूजा पाठ के अवसर पर आराध्य देव के घर में पदार्पण की अभिलाषा में उनके पद चिह्नों को प्रतीक रूप में तथा उनके स्वागत हेतु घर के आंगन व पूजा के स्थान पर चित्रित किया जाता है। इसके पीछे गृह हित की अभिलाषा व कल्याण की भावना छिपी है। राजस्थान में मांडणों में इनका चित्रण सर्वाधिक होता है।
  • साट्या या सातिये- यह बच्चों के जन्म के अवसर पर बनाया जाता है। इसे ग्रामीण महिलाएँ भिन्न-भिन्न आकारों में दरवाजों की चौखट के चारों तरफ बनाती हैं। साट्या को स्वास्तिक के नाम से भी जाना जाता है, जो चारो दिशाओं को संबोधित करता है।
  • ताम – यह मांडणा विवाह के अवसर पर लग्न मंडप के समय बनाया जाता है जिसको दाम्पत्य जीवन की सुख शान्ति के लिए अंकित करते हैं।
  • चौकड़ी मांडणा – यह होली के अवसर पर बनाया जाता है जिसके चार कोण होते हैं। इनका मानना है कि चारों दिशाओं से घर में रंग बिखरता रहे, खुशियाँ एकत्रित होती रहें।

काष्ठ कला

  • अनेक प्रकार की कला कारीगरी के साथ-साथ मेवाड़ लकड़ी की दस्तकारी और शिल्प कौशल का एक बड़ा केन्द्र रहा है। मेवाड़ का बस्सी गाँव इन कलात्मक काष्ठ रूपों के अंकन के लिए बड़ा प्रसिद्ध रहा है। बस्सी में काष्ठ कला के जन्मदाता स्वर्गीय प्रभातजी सुथार माने जाते है, जिन्हें यहाँ के तत्कालीन शासक रावत गोविन्ददास जी सन् 1652 में मालपुरा (टोंक) से यहाँ लाये। प्रमुख काष्ठ रूप निम्न हैं :-
  • कठपुतली : इसकी जन्मस्थली राजस्थान है। इसके नचाने वाले नट या भाट जाति के लोग होते हैं। मारवाड़ इन नटों का मुख्य स्थल है। कठपुतली बनाने का काम आमतौर पर उदयपुर, चित्तौड़गढ़ व कठपुतली नगर (जयपुर) में होता है। पुतली के क्षतिग्रस्त होने पर इन्हें फेंका नहीं जाता बल्कि जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। स्व. श्री देवीलाल सामर के नेतृत्व में लोककला मंडल, उदयपुर ने कठपुतली कला के विस्तार और इसमें नवीन आयाम जोड़ने तथा इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कठपुतली खेलों में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की सिंहासन बत्तीसी, पृथ्वीराज संयोगिता व नागौर के अमरसिंह राठौड़ का खेल सर्वाधिक लोकप्रिय है। कठपुतलियाँ अरडू की लकड़ी की बनाई जाती हैं। भारत में मुख्यतः चार प्रकार की कठपुतलियों का प्रचलन है :1. दस्ताना पुतली, 2. छड़ पुतली, 3. छाया पुतली व 4. धागा या सूत्र पुतली।
  • तोरण : विवाह के अवसर पर दुल्हन के घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लटकायी जाने वाली लकड़ी की कलाकृति जिसके शीर्ष पर मयूर या सुग्गा बना होता है, जिसे दूल्हा दुल्हन के घर में प्रवेश करने से पूर्व हरी डाली, तलवार, खांडे या गोटा लगी डंडी से स्पर्श करता है। तोरण शक्ति परीक्षण का प्रतीक भी होता है। जयपुर के विद्याधर जी के रास्ते (त्रिपोलिया बाजार) में तोरण बहुतायत से बनाये जाते हैं। कहीं-कहीं तोरण के स्थान पर ‘मोवण'(माणकथम्भ) का भी प्रचलन है, जो मुख्य द्वार पर या द्वार के बाहर गाड़े जाते हैं।
  • कावड़ : कावड़ विविध कपाटों में खुलने व बंद होने वाली मंदिरनुमा काष्ठ कलाकृति है जिस पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक व पौराणिक कथाओं से संबंधित देवी-देवताओं के मुख्य-मुख्य प्रसंग चित्रित होते हैं। यह एक चलता फिरता देवघर है। कावड़ का मूल उद्देश्य जहाँ भक्तों को भगवद्गाथा सुनाना व दर्शन कराना है, वहीं कावड़-वाचन-दर्शन से प्राप्त दानदक्षिणा द्वारा गौसंवर्धन की भावना भी संबद्ध है। कावड़ के चित्रों में राम जीवन की बहुलता के कारण इसे ‘रामजी की कावड़ भी कहते हैं। कावड़िया भाट इसका वाचन करता है। कावड़ बनाने का कार्य ‘बस्सी’ गाँव के खेरादी जाति के लोग करते हैं। कावड़ चितरावण में यहाँ के माँगीलाल मिस्त्री ने बड़े अच्छे प्रयोग किए हैं।

साँझी

  • साँझी यह राजस्थानी कन्याओं का अत्यंत रंगीन व कलापूर्ण व्रतोत्सव है जो आश्विन माह में श्राद्धपक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमा तक पितृपक्ष के पूरे पन्द्रह दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान कन्याएँ विविध प्रकार की लोकरंजित सांझियाँ बनाती है। साँझी के चित्रण में गोबर के अतिरिक्त मिट्टी, चूना, पुष्प, पीतरा-पन्नी, हल्दी, कुंकुम, कौड़ी एवं मिर्च आदि का प्रयोग कर उन्हें अलंकृत किया जाता है। नाथद्वारा के श्रीनाथ के मंदिर की केले की संझ्या’ (कदली पत्तों की साँझी) भारत भर में प्रसिद्ध है। नाथद्वारा में अंतिम दिन की साँझी को कोट साँझी कहते है। उदयपुर का मछन्दरनाथ मंदिर अपनी सांझियों के लिए इतना प्रसिद्ध है कि उसका नाम ही ‘संझ्या मंदिर’ पड़ गया है। जयपुर के लाडली जी का मंदिर में श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन आकर्षक साँझी बनाई जाती है। साँझी की प्रतिष्ठा राजस्थान में लोक देवी गौरी (पार्वती) के रूप में भी है।

थापा

  • थापा हाथ की अंगलियों के ढप्पे देकर दीवार पर जो चित्र बनाए जाते हैं वे थापे कहलाते हैं। राजस्थान में थापों के साथ स्वास्तिक अंकित करने की भी प्रथा है। ये थापे कुंकुम, काजल, मेंहदी, हल्दी, सिंदूर, गैरूं, गोबर तथा ऐपण से बनाए जाते हैं। विविध व्रतोत्सवों पर महिलाएँ दीवारों पर इनका अंकन कर तथा तत्संबंधी कथाएँ कहकर अपना व्रत अनुष्ठान करती हैं।

पाने

  • विभिन्न देवी-देवताओं के कागज पर बड़े चित्र ‘पाने’ कहलाते हैं । विभिन्न त्यौहारों पर इन्हें दीवार पर चिपका कर पूजन किया जाता है। राजस्थान में गणेश, लक्ष्मी, रामदेव, गोगाजी, श्री नाथजी, कृष्ण, शिव-पार्वती आदि के पाने प्रचलित हैं।

मिनिएचर वुडन टेम्पल

  • बेवाण (लकड़ी का छोटा सा मंदिर) को मिनिएचर वुडन टेम्पल भी कहते हैं। अनन्त चतुर्दर्शी एवं देवझूलनी एकादशी को बेवाण निकालने की परम्परा सदियों से चली आ रही है।

मेंहदी-महावर

  • मेंहदी-महावर मेंहदी या महावर रचाना एक ओर नारी सौंदर्य प्रसाधनों में गिना जाता है तो दूसरी ओर यह परम्परा से चली आ रही मांगलिक लोककला भी है। राजस्थान में इसे सुहाग व सौभाग्य का शुभ चिह्न माना जाता है। राजस्थान में सोजत (पाली) की मेंहदी प्रसिद्ध है। मेंहदी का हरा रंग जहाँ एक ओर हरीतिमा, प्रसन्नता व समृद्धि का परिचायक है वहीं लाल रंग प्रेम, रंग व जीवन संगीत का प्रतीक है।

गोदना

  • गोदना यह अंग चित्रांकन की विशिष्ट कला है। अंगों में सुई अथवा बबूल के कांटे से आकृति बनाने के बाद उस पर कोयला और खेजड़े के पत्तों का काला पाउडर डाल दिया जाता है। यह पाउडर खून भी सोख लेता है तथा अंग में एक स्थाई निशान बना देता है। सूखने के बाद इसमें हरी झांई उभर आती है इसे गुदना या गोदना कहते हैं । गोदना राजस्थान की पिछड़ी जातियों में प्रचलित महिलाओं एवं पुरुषों का विशिष्ट लोक श्रृंगार है।

पिछवाइयाँ

  • पिछवाइयाँ मंदिरों में देवी-देवताओं की मूर्तियों की पृष्ठभूमि में सज्जा हेतु बड़े आकार के पर्दो पर किया गया चित्रण ‘पिछवाइयों कहलाता है। ये मुख्यतः अवतारों के प्रमुख स्वरूप लिए होते हैं। नाथद्वारा की पिछवाइयाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। पिछवाई चित्रण नाथद्वारा के जांगिड़ व गौड़ ब्राह्मण जाति के परिवार करते हैं

बटेवड़े या थापड़ा

  • ढूंढाड़ अंचल में बनाये जाने वाले गोबर के बटेवड़े भी लोककला के अनूठे दस्तावेज हैं। गोबर के सूखे उपलों को वर्षा रखने के लिए उन्हें चौकोर अथवा आयताकार रूप में इकट्ठा कर इस ढेर को पुन: गोबर से लीप दिया जाता है और गोबर की ढालू छत बना दी जाती है। चारों तरफ से गोबर की लिपाई से बंद उपलों के ढेर को ही बटेवड़ा कहते हैं। 

वील

  • राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में घर की छोटी-मोटी चीजों को सुरक्षित रखने हेतु बनाई गई मिट्टी की महलनुमा चित्रित ‘वील’ कहलाती है। मेघवाल जाति की महिलाएँ इस कला में निपुण होती हैं।

हीड़

  • मिट्टी का बना हुआ पात्र, जिसमें ग्रामीण अंचलों में दीवाली के दिन बच्चे तेल व रूई के बिनौले जलाकर अपने परिजनों के यहाँ जाते हैं तथा हीडो दीवाली तेल मेलो’ कहकर बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। एक बच्चों की होड़ भी होती है जिसमें चार मिट्टी के प्याले होते हैं। इसमें बच्चों के माता-पिता द्वारा मक्का के फूले भरकर बच्चों से उसकी पूजा करवाई जाती है। उसको हीड़ भरना कहते हैं

बटेवड़े या थापड़ा

  • ढूंढाड़ अंचल में बनाये जाने वाले गोबर के बटेवड़े भी लोककला के अनूठे दस्तावेज हैं। गोबर के सूखे उपलों को वर्षा रखने के लिए उन्हें चौकोर अथवा आयताकार रूप में इकट्ठा कर इस ढेर को पुन: गोबर से लीप दिया जाता है और गोबर की ढालू छत बना दी जाती है। चारों तरफ से गोबर की लिपाई से बंद उपलों के ढेर को ही बटेवड़ा कहते हैं। 

घोड़ा बावसी

  • मिट्टी के बने कलात्मक घोड़े, जिनकी आदिवासी भील, गरासियों में बड़ी मान्यता है । मनौती पूरी होने पर इन्हें पूजकर इष्ट देवता के चढ़ाया जाता

कोठियाँ

  • राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में अनाज संग्रह हेतु प्रयुक्त मिट्टी के कलात्मक पात्र ।

सोहरियाँ

  • भोजन सामग्री रखने के मिट्टी के बने कलात्मक पात्र जो ग्रामीण अंचलों में प्रचलित हैं।

मोण

  • मेड़ता क्षेत्र में बनाये जाने वाले मिट्टी के बड़े माटे (मटके)।

भराड़ी

  • आदिवासी भीलों द्वारा लड़की के विवाह पर घर की दीवार पर बनाये जाने वाला लोक देवी का मांगलिक चित्र । यह चित्र घर के जवाई द्वारा चावल के विविधरंगी घोल से बनाया जाता है।

गोरबन्द

  • ऊँट के गले का आभूषण जो काँच, कौड़ियों, मोतियों व मणियों को गूंथकर बनाया जाता है। इसके संबंध में ‘गोरबंद नखरालो’ लोकगीत प्रसिद्ध है।

महत्वपूर्ण तथ्य :-

  • जालोर जिले में हरजी गाँव के कुम्हार मामाजी के घोड़े बनाते हैं जिन्हें खरीदने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं।
  • सूत कातने के चरखे को रहंटा और भैरेला भी कहते है।
  • बाड़मेर व शेखावाटी में कलात्मक व नक्काशीदार फर्नीचर बनाया जाता है। बीकानेर व शेखावाटी के मकानों में सम्पूर्ण छत और नीचे की लकड़ी की मठोठ में उत्कृष्ट चित्रकारी में चन्दरस का काम होता है। हाथी दाँत व चन्दन की कलाकृतियाँ बनाने का काम जयपुर, मेड़ता, जोधपुर व उदयपुर में अच्छा होता है। हाथी दाँत की पटरी पर चित्र बनाने का काम नाथद्वारा उदयपुर व जयपुर में विशेष रूप से होता है।
  • सिरोही में तलवारें व ढालें बनाने का काम उत्कृष्ट कोटि का होता है।
  • व्हाइट मैटल के बड़े आकार के पशु-पक्षी, फर्नीचर आदि उदयपुर में बड़े पैमाने पर बनाए जाते हैं।
  • जोधपुर में जिंक मैटल की वस्तुएँ बनाने का कार्य खूब होता है।
  • मोती : बाँसवाड़ा में कल्चर्ड मोती (मानव की सहायता से तैयार मोती) का उत्पादन किया जा रहा है। जयपुर में मोती की सफाई तथा विंधाई का काम होता है।

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राजस्थान की लोक कलाएँ के 50 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर : 50 important questions on folk arts of Rajasthan

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