राजस्थान के प्रमुख पर्व और त्यौहार : भारत के प्रमुख त्यौहार : Major Festivals of Rajasthan

By | July 15, 2021
Rajasthan ke pramukh tyohaar

 राजस्थान के प्रमुख पर्व और त्यौहार : (Important Festivals of Rajasthan)

हमारा देश त्योहारों का देश है पुरे विश्व की सर्वाधिक त्योहार भारत में मनाये जाते है जिसमे राजस्थान अपने पर्वो व त्योहारों में विशेष स्थान रखता है प्रत्येक त्यौहार की अपना मान्यता होती है। मानवीय पर आधारित ऐसे त्योहारों को मनाते रहने की परम्परा हमारे देश एवं प्रदेशों में प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। राजस्थान में प्रसिद्ध लोकोक्ति ‘तीज तिवाराँ बावडी,ले डबी गणगौर’ प्रसिद्ध है, जिसका अर्थ है कि तीज (श्रावणी तीज) बों को वापस लेकर आई है और गणगौर उन्हें लेकर डब गई। अर्थात हमारे यहाँ गणगौर के साथ ही प्रमुख त्योहारों का माप्ति हो जाती है और ग्रीष्म ऋतु के दो माहों में यहाँ कोई विशेष त्योहार नहीं मनाया जाता। दो माह के इस शुष्क और नीरस की नीरवता को श्रावण मास की ठण्डी फुहारें प्रकृति को हरियाली की चनर पहना कर तोडती हैं । श्रावणी तीज (छोटी तीज) ही राजस्थान के जन-जीवन में त्योहारों का उल्लास प्रारंभ हो जाता है।

हिन्दुओं के प्रमुख त्यौहार 

  • श्रावणी तीज या छोटी तीज — यह मुख्यतस्त्रियों व नव विवाहिताओं का त्योहार है जिसमें स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं। जयपुर में इस दिन ‘तीज माता’ की भव्य सवारी निकाली जाती है। राजस्थान में तीज के साथ ही मुख्यतः त्योहारों का आगमन माना जाता है जो गणगौर के साथ समाप्त होता है। छोटी तीज ‘पार्वती’ का प्रतीक मानी जाती है। भीषण गर्मी व धूल भरी आँधियों से भरी नीरस ग्रीष्म ऋतु के बाद शीतल वर्षा ऋतु का आगमन होता है और इसी के साथ राज्य के सांस्कृतिक जनजीवन में त्योहारों की शुरुआत श्रावणी तीज से होती है। तीज के एक दिन पहले नवविवाहिताएँ अपने पीहर आती हैं और अपने ससुराल से आये सिंजारे (कपड़ेआभूषण आदि) से अपना श्रृंगार (सिंजारा) करती हैं। राजस्थान में तीज का त्योहार विवाह पश्चात् पीहर में मनाने की परम्परा है। यहाँ मान्यता है कि विवाह के पश्चात् पहले सावन (श्रावण मास) में सास व बहू को साथ नहीं रहना चाहिए। अत: नवविवाहिता को पीहर भेज दिया जाता है। इस त्योहार पर नवविवाहिताएँ झूलाझूलती हैं एवं ऋतु एवं शृंगार से संबंधित गीत गाती हैं। जयपुर की तीज की सवारी विश्व प्रसिद्ध है।
  • बूढी तीज (भाद्र कृष्णा 3) — इस दिन व्रत रखकर गायों का पूजन करते हैं। सात गायों के लिए आटे की सात लोई बनाकर उन्हें खिलाकर ही भोजन ग्रहण किया जाता है।
  • ऊब छठ (भाद्र कृष्णा 6) — इस दिन उपवास किया जाता है व सायंकाल को स्नान करके सूर्य भगवान की चन्दन व पुष्प से पूजा कर अर्घ्य दिया जाता है। तत्पश्चात् चन्द्रोदय तक खड़े ही रहते हैं। चन्द्रोदय के पश्चात् चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजा कर व्रत खोलते हैं । इस व्रत को ‘चंदन षष्ठी व्रत’ भी कहा जाता है।
  • ऊब छठ (भाद्र कृष्णा 6) — इस दिन उपवास किया जाता है व सायंकाल को स्नान करके सूर्य भगवान की चन्दन व पुष्प से पूजा कर अर्घ्य दिया जाता है। तत्पश्चात् चन्द्रोदय तक खड़े ही रहते हैं। चन्द्रोदय के पश्चात् चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजा कर व्रत खोलते हैं । इस व्रत को ‘चंदन षष्ठी व्रत’ भी कहा जाता है।
  • रक्षा बंधन (श्रावण पूर्णिमा) — भाई व बहिन के प्रेम के प्रतीक इस त्योहार के दिन बहनें अपने भाइयों की कलाइयों पर रंगबिरंगी राखियाँ बाँध कर रक्षा का वचन लेती हैं व उनके जीवन की मंगलकामना करती हैं। इस दिन घर के प्रमुख द्वार के दोनों ओर श्रवण कुमार के चित्र बनाकर पूजन (श्रवण पूजन) करते हैं। इसे नारियल पूर्णिमा’ (सत्य पूर्णिमा) भी कहते हैं । रक्षाबंधन के दिन भारत के प्रसिद्ध तीर्थ अमरनाथ में बर्फ का शिवलिंग बनता है।
  • बडी तीज/सातडी तीज/कजली तीज  — यह त्योहार स्त्रियों द्वारा सुहाग की दीर्घायु व मंगलकामना के लिए मनाया है। जिसमे स्त्रियाँ दिन भर निराहार रहकर (व्रत रखकर) रात्रि को चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण करती हैं। इस दिन संध्या पश्चात् स्त्रियाँ नीम की पूजा कर तीज माता की कहानी सुनती हैं। इस दिन सत्तू खाया जाता है। बूंदी में कजली तीज’ की भव्य सवारी निकलती है।
  • बछबारस (भाद्रपद कृष्णा 12) — इस दिन पुत्रवती स्त्रियाँ पुत्र की मंगलकामना के लिए व्रत करती हैं। इस दिन गेहूँ, जौ और गाय के दूध से बनी वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया जाता है तथा अंकुरित चने, मटर, मोठ व मूंग युक्त भोजन किया जाता है। इस दिन गाय व बछड़ों की सेवा-पूजा की जाती है।
  • हल षष्ठी (भाद्रपद कृष्णा 6) — यह त्योहार कृष्ण भगवान के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन हल की पूजा की जाती है व गाय के दूध और दही का सेवन नहीं किया जाता। इस व्रत को पुत्रवती स्त्रियाँ करती हैं।
  • कृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्णा 8) — इसे कृष्ण जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से संबंधित झाँकियाँ सजाई जाती हैं। पूरे दिन उपवास के बाद रात के बारह बजे श्री कृष्ण जन्म होने पर श्रीकृष्ण की आरती व विशेष पूजा-अर्चना करके भोजन ग्रहण किया जाता है।
  • गोगा नवमी (भाद्रपद कृष्णा 9) — इस दिन लोकदेवता गोगाजी की पूजा की जाती है। हनुमानगढ़ जिले में ‘गोगामेड़ी’ नामक स्थान पर मेला भरता है। जहाँ लाखों तीर्थयात्री मेले में आकर गोगाजी की पूजा अर्चना करते हैं।
  • सतियाँ अमावस — भादवा बदी अमावस्या को सतियाँ की अमावस कहते हैं।
  • हरतालिका तीज (भाद्रपद शुक्ला 3) — इस पर्व को गौरी-शंकर का पूजन करके मनाया जाता है । इस व्रत को सभी प्रकार की स्त्रियाँ कर सकती हैं। पूरे दिन निराहार रहकर सायंकाल स्नानादि के पश्चात् पार्वती व शिव की पूजा की जाती है। तेरह प्रकार के मीठे व्यंजन बनाकर कल्पे जाते हैं।
  • शिवा चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ला 4) — इस दिन स्त्रियाँ उपवास करती हैं तथा अपने सास-ससुर को घी, गुड़, लवण आदि से बना भोजन परोसती हैं।
  • गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ला 4) — इस पर्व को संपूर्ण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। विघ्न विनायक श्री गणेश जी को देवताओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इनका वाहन चूहा है व मोदक इनका प्रिय भोग है। महाराष्ट्र में यह त्योहार विशिष्ट रूप से मनाया जाता है व जुलूस निकालकर गणपति की प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाता है। इस पर्व को गणेश जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं। मंदिरों में गणेश जी की झाँकियाँ सजाई जाती हैं व श्रद्धालुगण लड्डू चढ़ाते हैं। इसे ‘चतरा चौथ’ भी कहते हैं। यह बच्चों का विशेष त्योहार है।
  • ऋषि पंचमी(भाद्रपद शुक्ला 5) — इस दिन गंगा स्नान का विशेष महात्म्य है। यह व्रत जाने-अनजाने हुए पापों के प्रक्षालन हेतु किया जाता है। इस दिन गणेश जी का कलश, नवग्रह तथा सप्त ऋषि व अरुंधति की पूजा करके कथा सुनी जाती है। माहेश्वरी समाज में राखी इस दिन मनाई जाती है।
  • राधाष्टमी(भाद्रपद शुक्ला 8) — यह राधा जी के जन्म के रूप में मनाया जाता है। इस दिन अजमेर की निम्बार्क पीठ सलेमाबाद में मेला मेला भरता है।
  • श्राद्धपक्ष (भाद्रपद पूर्णिमा) — इस दिन से सर्वपितृ श्राद्ध पक्ष प्रारंभ हो जाता है तथा आश्विन अमावस्या तक चलता है। इस अवधि में श्राद्ध किया जाता है। बुजुर्गों की मृत्यु तिथि के दिन श्रद्धापूर्वक तर्पण और ब्राह्मण को भोजन कराना ही श्राद्ध है।
  • नवरात्रा — यह वर्ष में दो बार मनाए जाते हैं। प्रथम नवरात्रा चैत्र शुक्ला एकम से नवमी तक व द्वितीय आश्विन शुक्ला एकम से नवमी तक होते हैं। नौ दिन तक दुर्गा की पूजा की जाती है व रामायण का पाठ किया जाता है। नवें दिन 9 कुंवारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है। चैत्र मास की नवरात्रि को वासंतीय नवरात्रि’ भी कहते हैं।
  • साँझी — इस त्योहार में 15 दिन तक (भाद्र पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या) कुंवारी कन्याएँ भाँति-भाँति की संझ्याएँ बनाती हैं व पूजा करती है।
  • दुर्गाष्टमी(आश्विन शुक्ला 8) — यह संपूर्ण भारत में विशेषतः प.बंगाल में उल्लासपूर्वक मनायी जाती है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा की जाती है एवं कन्याओं को भोजन कराया जाता है। इसे ‘माता अष्टमी’ एवं ‘वीर अष्टमी’ भी कहते हैं। नवरात्रों में आश्विन एकम् से नवमी तक लोग व्रत रखते हैं एवं नवरात्रों में रोजाना दुर्गा माता की पूजा अर्चना करते हैं। आठवें नवरात्रे के दिन दुर्गाष्टमी आती है। इस दिन ‘शस्त्र पूजा’ भी की जाती है। दुर्गाष्टमी को महा अष्टमी भी कहते हैं। अष्टमी के दिन 8 कुँवारी कन्याओं को आमंत्रित कर उनकी पूजा कर भोजन कराया जाता है एवं उपहार दिये जाते हैं। नवरात्रों में डाण्डिया भी खेला जाता है।
  • दशहरा (आश्विन शुक्ला10) — यह त्योहार संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम ने रावण का वध कर बुराई पर विजय पाई थी। इसलिए इसे विजयादशमी भी कहते हैं। इस दिन सूर्यास्त होते ही रावण, कुंभकरण व मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। राजस्थान में कोटा शहर में तथा भारत के मैसूर शहर में दशहरे का बहुत बड़ा मेला लगता है। दशहरे पर शमी वृक्ष (खेजड़ी) की पूजा की जाती है और लीलटास पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।
  • शरद पूर्णिमा (आश्विन पूर्णिमा) — आश्विन पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं। ज्योतिषियों के अनुसार संपूर्ण (आश्विन पूर्णिमा) वर्ष में केवल इसी दिन चन्द्रमा षोडश कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस दिन व्रत किया जाता है।
  • करवा चौथ (कार्तिक कृष्णा 4) — यह त्योहार स्त्रियों का सर्वाधिक प्रिय त्योहार है । इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ व्रत करती हैं व सायंकाल चंद्रोदय पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर भोजन करती हैं व पति के स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं मंगल की कामना करती हैं।
  • अहोई अष्टमी (कार्तिक कृष्णा 8) — इस दिन पुत्रवती स्त्रियाँ निर्जल व्रत करती हैं। दीवार पर स्याऊ माता व उसके बच्चे बनाए जाते हैं व शाम का चंद्रमा को अर्घ्य देकर भोजन किया जाता है।
  • धनतेरस — इस दिन धन्वंतरि वैध जी का पूजन किया जाता है। इस दिन यमराज का भी पूजन किया जाता है। यम के लिए आटे का दीपक बनाकर घर के मख्य द्वार पर रखा जाता है। इस दिन नए बतन खरीदना शुभ माना जाता है। यह दीपावली से दो दिन पहले मनायी जाती है।
  • रूप चतुर्दर्शी (कार्तिक कृष्णा 14) — इस पर्व का संबंध स्वच्छता व सौंदर्य से है। इसलिए इस दिन घर की सफाई करके चूने से पोतकर उसे स्वच्छ  किया जाता है। इस दिन छोटी दीपावली भी मनाई जाती है।
  • दीपावली (कार्तिक अमावस्या) — यह हिन्दुओ का सबसे बड़ा त्योहार है। इस दिन भगवान राम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण करके सीता व लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। यह पर्व लक्ष्मी का उत्सव है। यह आर्य समाज के संस्थापक महाष दयानन्द व भगवान महावीर का निर्वाण दिवस भी माना जाता है। इस दिन वैश्य लोग अपने अपने बही खाते बदलते हैं और वर्ष भर की लाभ-हानि का विवरण बनाते हैं। इस दिन घर, दुकानों व शहर को खूब सजाया संवारा जाता है। सभी नए कपडे पहनते हैं, मिठाइयाँ बनाई जाती हैं, शाम को लक्ष्मी पूजन किया जाता है व पटाखे छोड़े जाते हैं।
  • गोवर्धन पूजा व अन्नकूट (कार्तिक शुक्ला 1) — इस दिन प्रभात के समय गाय के गोबर से गोवर्धन की पूजा की जाती है व छप्पन प्रकार के पकवानों से बने अन्नकूट से मंदिर में भोग लगाया जाता है। नाथद्वारा कांकरोली व कोटा के अन्नकूट महोत्सव प्रसिद्ध हैं। यहा इसे पुष्टिमागीय परम्परा से मनाते हैं।
  • भैयादूज (कार्तिक शक्ला 2) — इस पर्व का प्रमुख लक्ष्य भाई-बहन के पावन संबंध तथा प्रेमभाव की स्थापना करना है। इस दिन बहनें भाई के तिलक लगाकर उनके स्वस्थ व दीर्घायु होने की मंगलकामना करती हैं। इसे यम द्वितीया के रूप में भी मनाया जाता है।
  • गोपाष्टमी (कार्तिक शुक्ला 8) — इस दिन गाय व बछड़े का पूजन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन गौओं को ग्रास देकर, उनकी परिक्रमा करके थोड़ी दूर तक उनके साथ जाने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • आँवला नवमी/अक्षय नवमी — इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है व भोजन में आँवला अवश्य लिया जाता है। इस व्रत को करने  से व्रत, पूजन, तर्पण आदि का फल अक्षय हो जाता है। इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।
  • देवउठनी ग्यारस (कार्तिक शुक्ला ) — इसे देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु चार माह तक निद्रावस्था में रहने के बाद जागते हैं। इस दिन से ही समस्त मांगलिक कार्य विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि प्रारंभ हो जाते हैं। प्रात:काल स्नान करके घर के आँगन में चौक पूर कर भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप में अंकित करते हैं। भगवान विष्णु की कदम्ब पुष्पों तथा तुलसी की मंजरियों द्वारा पूजा की जाती है। इसे पापमुक्त करने वाली व मुक्ति देने वाली एकादशी माना जाता है। इस दिन तुलसी-सालिगराम विवाह का आयोजन भी किया जाता है। कुछ जगह यह विवाह अगले दिन (द्वादशी को) भी संपन्न होता है। इस दिन भगवान का विवाह होने पर इसे अबूझ सावा कहते हैं। इसे तुलसी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन तुलसी की पूजा की जाती है व व्रत रखा जाता है। तुलसी नामक पौधे की महिमा वैद्यक ग्रंथों के साथ-साथ धर्मशास्त्रों में भी वर्णित की गई है। तुलसी को विष्णु प्रिया भी माना गया है।
  • मकर संक्रांति — यह सदैव 14 जनवरी को ही मनाई जाती है। इस संक्रांति में मकर राशि पर सूर्य होने के कारण इसका विशेष महत्त्व है। संक्रांति के एक दिन पूर्व तिल के लड्ड, पपड़ी, बरफी, फीनी आदि बनाये जाते हैं। इस दिन दिल खोलकर दान-पुण्य करने का विशेष महत्त्व होता है। जयपुर में इस दिन सभी पतंग उड़ाते हैं। इस दिन रूठी सास को मनाए जाने की भी प्रथा है। सुहागिन स्त्रियाँ सुहाग की तेरह वस्तुएँ कलप कर तेरह सुहागिनों को देती हैं।
  • कार्तिक पूर्णिमा — इस दिन महादेवजी ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसलिए इसे ‘त्रिपुर पूर्णिमा’ भी कहते हैं। इस दिन गंगा या पुष्कर में स्नान किया जाता है। कार्तिक माह के व्रत व स्नान जो शरद पूर्णिमा से आरम्भ होते हैं व कार्तिक पूर्णिमा को पूर्ण होते हैं। इस दिन भगवान का मत्स्य अवतार हुआ था। इस दिन पुष्कर में विशाल मेला भरता है।
  • माघ पूर्णिमा — माघ मास की पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बड़ा महत्त्व है। स्नान पर्वो का यह अंतिम प्रतीक है। इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर विष्णु पूजन, पितृ श्राद्ध कर्म तथा भिखारियों को दान देने का विशेष महत्त्व है। इस दिन गंगा स्नान/पुष्कर स्नान करने का भी विशेष महत्त्व है। इस दिन बेणेश्वर धाम में विशाल मेला भरता है।
  • तिल चौथ (माघ कृष्णा 4) — इस दिन श्री गणेश जी व चौथ माता के तिलकुट्टे का भोग लगाया जाता है। इसे सकट चौथ भी कहते हैं। इस दिन चौथ का बरवाड़ा (सवाई माधोपुर) में चौथ माता के भव्य मंदिर में विशाल मेला भरता है।
  • षट्तिला एकादशी (माघ कृष्णा 11) — इसके अधिष्ठाता देव भगवान विष्णु हैं। इस दिन काली गाय और काले तिलों के दान का विशेष महत्त्व है। 6 प्रकार के तिलों का प्रयोग होने से इसे षटतिला एकादशी कहते हैं।
  • बसंत पंचमी (माघ शुक्ला 5) — यह दिन ऋतुराज बसंत के आगमन का प्रथम दिवस माना जाताहै। भगवान श्रीकृष्ण इस उत्सव के अधिदेवता (माघ शुक्ला 5) हैं, इसलिए ब्रज प्रदेश में आज के दिन राधा और कृष्ण की लीलाएँ रचाई जाती हैं। इस दिन से फाग उड़ाना प्रारंभ करते हैं जिसका क्रम फाल्गन की पर्णिमा तक चलता है। गेहूँ और जौ की स्वर्णिम बगलियाँ भगवान को अर्पित की जाती हैं। बसंत ऋत कामोद्दीपक होती है। इस दिन कामदेव और रति का प्रधान रूपसे पूजन करते हैं बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की पूजा भी की जाती है। इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं व घरों में पीले मीठे चावल बनाकर खाते हैं।
  • शिवरात्रि (फाल्गुन कृष्णा 13) — यह भगवान शिव का जन्मोत्सव है। इस दिन श्रद्धालुगण व्रत रखते हैं व शिव पुराण का पाठ करते हैं। दूसरे दिन प्रातः जौ, तिल, खीर, बिल्व पत्रों का हवन करके ब्राह्मणों को भोजन कराकर व्रत का पारण किया जाता है।
  • ढूंढ (फाल्गुन सुदी 11) — बच्चा होने पर हँढ होली से पहले वाली ग्यारस को पजते हैं। जब किसी के यहाँ लडका पैदा हो तो उसी वर्ष ढूँढ पूजी जाती है। इस अवसर पर नवजात के ननिहाल से उपहार आदि आते हैं।
  • होली (फाल्गुन पूर्णिमा) — इस दिन हिरण्यकश्यप की आज्ञा पर उसकी बहन होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट होती है लेकिन प्रह्लाद बच जाता है व होलिका जल जाती है। अत: भक्त प्रह्लाद की स्मृति में इस पर्व को मनाया जाता है। इस दिन सब स्त्रियाँ कच्चे सूत की कूकड़ी, जल का लोटा, नारियल आदि द्वारा होली की पूजा करती हैं। होली में कच्चे चने युक्त हरी डालियाँ व कच्चे गेहूँ की बालियाँ आदि भूनकर घर लाई जाती हैं। होली जलने पर पुरुष होली के डंडे को बाहर निकालते हैं क्योंकि इस डंडे को भक्त प्रह्लाद का प्रतीक माना जाता है।
  • धुलंडी नाव (चैत्र कृष्णा 1) — चैत्र माह की कृष्णा प्रतिपदा को होली के दूसरे दिन धुलंडी मनायी जाती है। इस दिन होली की अवशिष्ट राख की वंदना की जाती है व रंग गुलालादि से सभी होली खेलते हैं। इस दिन ब्यावर में बादशाह का मेला तथा शाहपुरा (भीलवाड़ा) में फूलडोल महोत्सव बड़े उल्लास के साथ मनाये जाते हैं। धुलण्डी के दिन बडे उल्लास के साथ होली खेली जाती है। श्रीमहावीरजी की लट्ठमार होली, भिनाय की कौड़ामार होली, ब्यावर की देवर-भाभी होली, बाड़मेर की पत्थरमार होली एवं इलोजी की सवारी तथा मेवाड़ के आदिवासियों की भगोरिया होली आदि प्रसिद्ध हैं।
  • घुड़ला का त्योहार (चैत्र कृष्णा 8) — यह त्योहार राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में चैत्र कृष्णा अष्टमी से लेकर चैत्र शुक्ला तृतीया तक मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियाँ एकत्रित होकर कुम्हार के घर जाकर छिद्र किए हुए एक घड़े में दीपक रखकर अपने घर गीत गाती हुई लौटती हैं। यह घड़ा बाद में तालाब में बहा दिया जाता है। इस त्योहार पर चैत्र सुदी शूक्ल तीज को मेला भरता है।
  • शीतला अष्टमी(चैत्र कृष्णा 8) — इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है व ठंडा भोजन किया जाता है। समस्त भोजन सप्तमी की संध्या को ही बनाकर रखा जाता है। अष्टमी को शीतलादेवी की पूजा कर ठण्डा भोजन ग्रहण किया जाता है। इस दिन रसोई में गर्म खाना नहीं बनता है। बच्चे के चेचक निकलने पर शीतला माता की ही पूजा की जाती है। अष्टमी को चाकसू में शीतला माता का विशाल मेला भरता है।
  • नववर्ष (चैत्र शक्ला 1) — हिन्दुओं का नववर्ष इसी दिन प्रारम्भ होता है । इस दिन गुड़ी पड़वा का त्योहार भी मनाया जाता है। बासन्तीय नवरात्रों का प्रारंभ इसी दिन से होता है जो नवमी तक चलता है। चैत्र शुक्ला नवमी के दिनरामनवमी मनाई जाती है।
  • अरुन्धती व्रत — यह व्रत चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा से आरम्भ होता है और चैत्र शुक्ला तृतीया को समाप्त होता है। स्त्रियों के चरित्रोत्थान के लिए यह वृत किया जाता है। जन्म जन्मान्तर के वैधव्य दोष से बचने के लिए स्त्रियों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।
  • सिंजारा —  यह त्योहार पुत्री और पुत्रवधु के प्रति प्रेम का प्रतीक है। गणगौर व तीज के एक दिन पूर्व सिंजारा भेजा जाता है। जिसमें साड़ी, शृंगार की सामग्री, चूड़ी, मेंहदी, रोली, मिठाई आदि पुत्री तथा पुत्रवधु के लिए भेजी जाती है।
  • गणगौर (चैत्र शुक्ला 3 ) — यह सुहागिन स्त्रियों का महत्वपूर्ण त्योहार है। यह शिव व पार्वती के अखंड प्रेम का प्रतीक पर्व है। गणगौर में ‘गण’ महादेव का व ‘गौरी’ पार्वती का प्रतीक है। इस दिन कुँवारी कन्याएँ मनपसंद वर प्राप्ति की तथा विवाहित स्त्रियाँ अपने अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। चैत्र कृष्णा एकम् से ही गणगौर पूजन आरम्भ हो जाता है व चैत्र शुक्ला तृतीया तक (कुल 18 दिन) यह क्रम चलता रहता है। इस दिन गणगौर की सवारी निकाली जाती है। जयपुर व उदयपुर की गणगौर प्रसिद्ध है। गणगौर का त्योहार राजस्थानी त्योहारों में सर्वाधिक गीतों वाला त्योहार है। नाथद्वारा में चैत्र शुक्ला पंचमी को गुलाबी गणगौर मनाई जाती है।
  • अशोकाष्टमी — (चैत्र शुक्ला 8) इस दिन अशोक वृक्ष के पूजन का विधान है।
  • रामनवमी — मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्म दिवस के रूप में यह त्योहार मनाया जाता है। इस दिन रामायण का पाठ किया जाता है। श्रद्धालुगण सरयू नदी में स्नान करके पुण्य लाभ कमाते हैं। यह अंतिम नवरात्रा को मनाई जाती है।
  • आखा तीज या अक्षय तृतीया — राज्य में कृषक सात अन्नों तथा हल का पूजन करके शीघ्र वर्षा की कामना के साथ यह त्योहार मनाते हैं। शास्त्रानुसार इस दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरम्भ माना जाता है क्योंकि इस दिन किया हुआ तप, जप, ज्ञान तथा दान अक्षय फलदायक होता है। संपूर्ण वर्ष में यह एकमात्र अबूझ सावा है। इस दिन राज्य में हजारों विवाह विशेषतः बाल विवाह सम्पन्न होते हैं, परन्तु अब धीरे-धीरे इनका प्रचलन कम हो रहा है।
  • वट सावित्री व्रत या बड़मावस (ज्येष्ठ अमावस्या) — इस व्रत से स्त्री को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत के अंतर्गत स्त्रियाँ बड़ या बरगद की पूजा कर पुत्र और पति की आरोग्यता के लिए प्रार्थना करती हैं। इसमें वट-सावित्री की कथा सुनी जाती है।
  • निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ला) — इस व्रत में एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं किया जाता है। इस व्रत से श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है।
  • पीपल पूर्णिमा — यह वैशाख पूर्णिमा को मनाई जाती है। इस दिन बुद्ध पूर्णिमा भी मनाई जाती है। यह भी एक अबूझ सावा माना जाता है।
  • योगिनी एकादशी(आषाढ़ कृष्णा 11) — इस एकादशी का व्रत करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा) — इस दिन गुरु-पूजन होता है व यथाशक्ति गुरुजी को भेंट दी जाती है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।

अन्य त्योहार

  • सावन के सोमवार — यह व्रत श्रावण मास के सभी सोमवारों को करते हैं। इस दिन शिवजी की पूजा की जाती है। इन्हें वन सोमवार अथवा सुखिया सोमवार भी कहते हैं क्योंकि इस दिन घर से खाना तैयार कर वन में किसी सुरम्य स्थल पर जाकर भोजन किया जाता है। 
  • मंगला गौरी पूजा — श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को गौरी की पूजा व व्रत किया जाता है। 
  • नाग पंचमी(श्रावण कृष्णा 5) — यह नागों का त्योहार है। इस दिन सर्प की पूजा की जाती है। कहीं-कहीं यह त्योहार श्रावण शुक्ला पंचमी को भी मनाया जाता है।  
  • निडरी नवमी (श्रावण कृष्णा 9) — सर्पो के आक्रमण से बचने के लिए श्रावण नवमी को नेवलों की पूजा की जाती है जिसे निडरी नवमी कहते हैं।
  • कामिका एकादशी — इस व्रत में विष्णु भगवान की पूजा की जाती है। 

मस्लिम समाज के त्यौहार 

  • मोहर्रम — यह मुसलमानों के हिजरी सन का पहला महीना है। इस माह में हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने सत्य और इंसाफ के लिए जुल्म और सितम से लड़ते हुए कर्बला के मैदान में शहादत पाई थी लेकिन धर्म विरोधियों के आगे सिर नहीं झुकाया था। उसी की याद में मुहर्रम उल हराम माह की 10 तारीख को मोहर्रम मनाया जाता है। इस दिन ताजिए निकाले जाते हैं। इन ताजियों को कर्बला के मैदान में दफनाया जाता है। 
  • इद-उल मिलादलनबी (बारावफत) —  यह त्योहार पैगम्बर हजरत मोहम्मद के जन्म दिन की याद में मनाया जाता है। मोहम्मद साहब का जन्म 570 ई. में मक्का (सऊदी अरब) में हुआ था। इस दिन जगह-जगह जुलूस निकाले जाते हैं व  हजरत मोहम्मद की जीवनी व शिक्षाओं पर प्रकाश डाला जाता है व विशेष प्रार्थनाएँ की जाती हैं। 
  •  इद-उल-फितर(मीठी ईद) — इसे ‘सिवैयों की ईद’ भी कहा जाता है। ईद’ शब्द का अर्थ ‘खुशी’ या ‘हर्ष’ होता है। मुस्लिम बन्धु  रमजान के पवित्र माह में 30 रोज तक रोजे करने के बाद शुक्रिया के तौर पर इस त्योहार को मनाते हैं।  ईदगाह में सामूहिक नमाज अदा करने के बाद सभी एक दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद  हैं। मीठी सिवैयाँ व अन्य पकवान बनाकर खिलाये जाते हैं। यह भाईचारे का त्योहार है।  
  • इदुलजुहा (बकरा ईद) — यह कुर्बानी का त्योहार है जो पैगम्बर हजरत इब्राहीम द्वारा अपने लड़के हजरत इस्माइल की अल्लाह को कुर्बानी देने की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन मुसलमान प्रतीक के रूप में बकरे की कुर्बानी देते हैं। इदुलजुहा के माह में ही मुसलमान हज करते हैं। 
  •  शबेरात — यह त्योहार शाबान माह की 14वीं तारीख की शाम को मनाया जाता है। यह माना जाता है कि इस दिन हजरत मुहम्मद साहब की आकाश में ईश्वर से मुलाकात हई थी। इस दिन मुसलमान भाई अपनी भूलों व पापों की माफी के लिए खुदा से प्रार्थना करते हैं।
  • शबेकद्र — यह रमजान माह की 27वीं तारीख को मनाया जाता है। इस दिन कुरान उतारा गया था। 

जैन पर्व

  • दशलक्षण पर्व — प्रतिवर्ष चैत्र, भाद्रपद व माघ माह की शक्ल पंचमी से पर्णिमा तक दशलक्षण पर्व मनाया जाता है। यह पर्व किसी व्यक्ति से संबंधित न होकर आत्मा से गुणों से संबंधित है। इनमें भाद्रपद माह में दशलक्षणों का महत्त्व सर्वाधिक है।
  • पर्युषण पर्व — जैन धर्म में पर्युषण पर्व महापर्व कहलाता है। पर्यषण का सात्विक अर्थ है निकट बसना। दिगम्बर परम्परा में इस पर्व का नाम दशलक्षण के साथ जुड़ा हुआ है जिसका प्रारंभ भाद्रपद सुदी पंचमी से होता है और समापन चतुर्दशी को। श्वेताम्बर परम्परा में इस पर्व का प्रारंभ भाद्रपद कृष्णा बारस से होता है व समापन भाद्रपद शुक्ला पंचमी को होता है। अंतिम दिन संवत्सरी पर्व मनाया जाता है। पर्युषण पर्व पर जैन धर्मावलम्बी सभी लोगों से अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना करते हैं।
  • त्रषभ जयंती — चैत्र कृष्ण नवमी को ऋषभ जयन्ती पर्व मनाया जाता है। इस दिन जैन समाज के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म हुआ था। 
  •  महावीर जयन्ती — 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म दिन चैत्र शक्ला त्रयोदशी को महावीर जयन्ती के रूप में मनाते हैं। इस दिन भगवान महावीर के जीवन से संबंधित झाँकियाँ निकाली जाती हैं। श्री महावीर जी (करौली) में इस दिन विशाल मेला भरता है। 
  • सुगंध दशमी पर्व —  भाद्रपद शुक्ल की दशमी को जैन मंदिरों में सुगंधित द्रव्यों द्वारा सुगन्ध करके यह पर्व मनाया जाता है। 
  • रोट तीज —  भाद्रपद शुक्ला तृतीया को जैन मतानुयायी रोट तीज का पर्व मनाते हैं जिसमें खीर व रोट (मोटी मिस्सी रोटियाँ) बनाई जाती है। 
  • पड़वा ढोक — यह दिगम्बर जैन समाज का क्षमायाचना पर्व है जो आश्विन कृष्णा एकम (प्रतिपदा) को मनाया जाता है।

सिंधी समाज के पर्व

  • थदड़ी या बड़ी सातम — इस दिन सिंधी समाज के लोग बासोड़ा मनाते हैं व पूरा दिन गर्म खाना नहीं खाते। थदड़ी उत्सव पर महिलाओं द्वारा पीपल के वृक्ष पर चाँदी की मूर्ति रखकर पूजन किया जाता है।
  • चालीहा महोत्सव — सिंध प्रांत के बादशाह मृखशाह के जुल्मों से परेशान होकर सिन्धी समाज के लोगों ने 40 दिन तक व्रत किया तथा चालीसवें दिन झूलेलाल का अवतार हुआ। इसी याद में प्रतिवर्ष सूर्य के कर्क राशि में आ जाने पर 16 जुलाई से 24 अगस्त तक की अवधि में चालीहा महोत्सव मनाया जाता है। 
  • चेटीचण्ड या झूलेलाल जयन्ती — सिंध के थट्टा नगर में झूलेलाल जी का चैत्र माह में जन्म हुआ जिन्होंने अत्याचारी राजा मृखशाह के झूलेलाल जयन्ती जुल्मों से लोगों को मुक्ति दिलाई थी। वे वरुण के अवतार माने जाते हैं । सिंधी समाज द्वारा उनका जन्म दिवस ‘चेटीचण्ड’ के पर्व के रूप में मनाया जाता है। 
  • असूचंड पर्व — फाल्गुन शुक्ला चौदस के दिन भगवान झूलेलाल के अंतर्धान होने पर यह पर्व मनाया जाता है।

सिक्ख समान के पर्व

  • लोहड़ी — मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या 13 जनवरी को यह त्योहार मनाया जाता है।
  • वैशाखी — 13 अप्रैल 1699 ई. को 10वें गुरु गोविन्द सिंह ने आनन्दपुर साहिब, रोपड़ (पंजाब) में खालसा पंथ की स्थापना की थी। तभी से 13 अप्रैल को यह त्योहार मनाया जाता है।
  • गुरुनानक जयन्ती — गुरुनानक सिक्ख धर्म के प्रवर्तक थे। इनकी जयन्ती कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती
  • गुरु गोविन्द सिंह जयन्ती — गुरु गोविन्द सिंह सिक्खों के 10वें व अंतिम गुरु थे। इन्होंने उत्तराधिकारी गुरु ग्रंथ साहिब’ को गुरु घोषित किया। पौष शुक्ला सप्तमी को इनका जन्म दिवस मनाया जाता है।

ईसाई समाज के त्यौहार 

  • क्रिसमस — 25 दिसम्बर को ईसा मसीह का जन्म दिन क्रिसमस के रूप में मनाया जाता है।
  • नव वर्ष दिवस — ईस्वी सन् की पहली जनवरी को नव वर्ष दिवस मनाया जाता है।
  • ईस्टर — ईसाइयों की मान्यता है कि इस दिन ईसा मसीह पुनर्जीवित हुए थे।
  • गुड फ्राइडे — ईस्टर के रविवार के पूर्व वाले शुक्रवार को यह त्योहार मनाया जाता है। इस दिन ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया था।
  • असेन्सन डे — ईस्टर के 40 दिन बाद ईसा मसीह के स्वेच्छा से पुनः स्वर्ग लौट जाने के उपलक्ष में ईसाई समाज द्वारा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
  • नवरोज — पारसियों के नववर्ष का प्रारम्भ नवरोज से होता है।

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